गुरुजी ने अपने संबोधन में बताया कि जब आकाश में वही ग्रह दोबारा आते हैं, तो यह कैसे संभव है कि ऋषि मुनि अब जन्म ही न लें। उनका कहना था कि महान आत्माएँ आज भी जन्म ले सकती हैं, लेकिन हमने तप, संयम और आत्ममंथन की परंपरा को छोड़ दिया है, इसलिए वैसी ऊँचाई दिखाई नहीं देती।
उन्होंने विशेष रूप से चंद्रमा, बुध और शुक्र की भूमिका समझाई। चंद्रमा मन और शरीर के जल तत्व से जुड़ा है। बुध हमारी बुद्धि, नसों और व्यवहार को संभालता है। शुक्र सृजन शक्ति, ऊर्जा, शोध और नई खोज करने की क्षमता देता है। गुरुजी ने कहा कि ऋषि मुनि हठ योग और ब्रह्मचर्य के द्वारा अपनी ऊर्जा की रक्षा करते थे। वही ऊर्जा उन्हें गहरा ज्ञान प्राप्त करने की ताकत देती थी।
गुरुजी ने आज के समाज की स्थिति पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि बच्चों को केवल किताबों तक सीमित कर दिया गया है, जबकि उन्हें जीवन के प्रैक्टिकल काम भी सीखने चाहिए। अधिक लाड़ प्यार, अकेलापन और गलत आदतें बच्चों को अंदर से कमजोर कर रही हैं, जिससे डिप्रेशन बढ़ रहा है। इस वीडियो का संदेश साफ है कि अगर हम अनुशासन, संस्कार और सही जीवनशैली अपनाएं, तो हमारे बच्चे भी तेजस्वी, आत्मविश्वासी और ज्ञानवान बन सकते हैं। यह केवल ज्योतिष की बात नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने का संदेश है।अगर हमारे अवतार वापस आते हैं यानी कि वही
ग्रह दोबारा फिर आकाश मंडल में आते हैं तो
ऐसा कैसे हो सकता है कि वो ऋषि मुनि अब ना
पैदा होते वो ऋषि मुनि अब भी पैदा होते
क्या वो अपनी कुंडली दिखा के ज्योतिषी बने
थे या कुंडली के अंदर योग वो कैसे रहे
होंगे जो आज की डेट में योग बनते ही नहीं।
तीन ग्रह जन्म कुंडली के अंदर बहुत
इंपॉर्टेंट होते हैं। एक होता है चंद्रमा,
एक होता है बुध और एक होता है शुक्र। इनको
मैनेज करने के लिए उन्होंने क्या किया?
पहले उन्होंने तप किया। तप करके हठ योग
में गए और हठ योग में जाकर के उन्होंने
ज्यादातर जो कोशिश करी अपने शुक्र को,
अपने वीर्य को, अपने कैल्शियम को बचाने
की। हमारे समाज का जो सत्यानाश हो रहा है
उसके पीछे कारण एक है कि बच्चों ने अपने
शुक्र को नालियों के अंदर बहा दिया। आई
थिंक मैंने आपकी जितनी भी स्पीच सुनी है
आज तक दिस इज द बेस्ट सो। इस स्पीच को कम
से कम 10 बार आपकी स्पीच सुनूंगा। फिर
मेरे ऊपर से निकलेगी। फिर मेरे अंदर आएगी।
[संगीत]
[संगीत]
जय माता की। जैसे-जैसे
रिसर्च बढ़ती जा रही है,
पोडियम पे आते ही ना कंफ्यूज सा हो जाता
हूं
कि क्या बोलूं, किस पे बोलूं और कितना
बोलूं। तो सबसे पहले
मीना जी को बधाई और बहुत-बहुत उनका
धन्यवाद कि उन्होंने यहां ब्रह्म सरोवर के
दर्शन करने के लिए हमें रास्ता दिखाया।
यहां पर इस धरती पर आना भी एक बहुत बड़ा
सौभाग्य है। तो जय श्री कृष्णा कृपा करें
दाता।
आज इतनी सारी बातें हो रही थी।
व जी तो वैसे ही लाजवाब है। यह बोलने लगते
हैं तो इनकी वाणी में ही खो जाते हैं हम।
और बात डिप्रेशन की भी हुई, कर्म की भी
हुई, भाग्य की भी हुई, त्रिकोण की भी हुई।
यह बातें सारी सत्य है।
लेकिन आप सोच के देखिए
कि वो जो हमारे ऋषि मुनि रहे
जिन्होंने तपस्या की और यहां बैठ के
उन्होंने तपस्या करते हुए पूरा आकाश मंडल
नाप के उन्होंने नक्षत्रों की बिल्कुल
सटीक प्रेडिक्शन ग्रहों की दूरी उनका कर्म
उनका स्वभाव यह सारा कुछ हमारे वेदों में
लिख डाला। वह कौन सी ताकत थी?
क्या वह अपनी कुंडली दिखा के ज्योतिषी बने
थे
या कुंडली के अंदर योग वह कैसे रहे होंगे
जो आज की डेट में योग बनते ही नहीं
ऐसा हो सकता है क्या नहीं
अगर हमारे अवतार वापस आते हैं
अगर हमारे अवतार वापस आते हैं यानी कि वही
ग्रह दोबारा फिर आकाश मंडल में आते हैं तो
थोड़े बहुत समय के हिसाब से जो हमारे कर्म
है, हालात है थोड़े बदल जाते हैं। लेकिन
अवतार तो अवतार होते हैं। तो ऐसा कैसे हो
सकता है कि वह ऋषि मुनि अब ना पैदा होते
हो। वो ऋषि मुनि अब भी पैदा होते हैं।
अब इसके पीछे अगर हम झांक के देखें कि अब
ऋषि मुनि मिल क्यों नहीं रहे? इसके पीछे
जो मैंने अपने
रिसर्च करी आत्म मंथन ही किया है।
तो उसमें मैंने पाया
कि तीन ग्रह जन्म कुंडली के अंदर बहुत
इंपॉर्टेंट होते हैं। एक होता है चंद्रमा,
एक होता है बुध और एक होता है शुक्र।
चंद्रमा क्यों? क्योंकि हमारे शरीर के
अंदर 70 72% जो पानी है वह सारा स्थान तो
चंद्रमा ने ले रखा है
और उसके बाद में आते तो खैर सारे ही ग्रह
हैं। लेकिन उसके बाद अगर स्थान किसी ने ले
रखा है तो वो ले रखा है हमारी नसों ने,
आतड़ियों ने, हमारे मसल्स ने इन्होंने वो
स्थान ले रखा है। और ये पानी और ये नसें
ये मिलके कर क्या रही हैं?
यह बनाती हैं हमारी हड्डियों की मजबूती
या वह सफेद कैल्शियम जो आदमी और औरत दोनों
की रीड की हड्डी को बनाना, उनकी हड्डियों
की मजबूती को मजबूत रखना, उसको सीधा खड़ा
रखना यह वाली ताकत बनाते हैं। ये
और यह वाली ताकत को ही शुक्र की ताकत बोला
जाता है।
तो इसका मतलब यह कितनी बड़ी चीज है।
तो यह अगर चंद्र, शुक्र और बुध मिलकर के
यह सारा खेल कर रहे हैं तो इस खेल में
क्या-क्या होता है? अब वहां पर ज्योतिष
बीच में आता है। उसके लिए लाल किताब का
सूत्र है
कि अगर बुध चंद्रमा से आगे के घरों में
बैठा हो। बुध चंद्रमा के आगे के घरों में
बैठा हो तो वह
बहुत इमोशनल इंसान होगा।
बहुत दिल से हर किसी का भला करना जो भी
चाहना अच्छा या बुरा जो भी चाहना वो दिल
से करने वाला।
समझ गए? तो यानी वो प्रैक्टिकल लाइफ में
जो होता है वो प्रैक्टिकल लाइफ को छोड़ के
इमोशनल लाइफ को चुनकर के जो भी कमाता है
उसके जरिए कमाता है।
लेकिन इसके विपरीत जब चंद्रमा आगे हो और
बुध पीछे हो आदमी प्रैक्टिकल होता है।
आदमी प्रैक्टिकल होता है। और ऐसी अवस्था
के अंदर
आदमी सिचुएशन के हिसाब से अपना लाभ देखते
हुए सिचुएशन के हिसाब से कभी आगे बढ़ता है
कभी पलटी मारता है। ये यूनिवर्सल लॉ है।
हर किसी की जन्म कुंडली के ऊपर अप्लाई
होता है। लेकिन इन दोनों के बीच में एक
कॉमन चीज क्या है? आदमी का वीर्य औरत का
यह कैल्शियम वाला पार्ट यह बनता चला जाता
है।
लेकिन कैसे जिसका भी बुध पीछे चंद्रमा आगे
यह लोगों का यह कैल्शियम पार्ट बहुत देर
तक बनता है।
और जिनका चंद्रमा पीछे और बुध आगे इनके
कैल्शियम पार्ट में समय के साथ में कमी
आती है।
कम बनने लगता है। तो ये तो जवानी के सुख
भोगने वाली बात भी हो गई कि कब तक कोई
भोगेगा? ये वहां तक भी पहुंच गया।
लेकिन सिर्फ यहीं तक नहीं अब बात आती है
कि हमारे ऋषि मुनि कैसे ऋषि मुनि बने
उन्होंने इतनी ताकत कैसे अर्जित की
अब जन्म कुंडली के अंदर उनके भी खराब ग्रह
होंगे ऐसा तो हो नहीं सकता कि वो खराब
ग्रह ना लेके पैदा हुए हो बिल्कुल होंगे
उन्होंने क्या किया अपनी लाइफ को अपने
माइंडसेट को उन्होंने फोकस किया चंद्र
शुक्र और बुध खुद को मैनेज करने में
इनको मैनेज करने के लिए उन्होंने क्या
किया? पहले उन्होंने तप किया। तप करके
उन्होंने हठ योग में गए और हठ योग में
जाकर के उन्होंने ज्यादातर जो कोशिश करी
वो कोशिश करी अपने शुक्र को, अपने वीर्य
को, अपने कैल्शियम को बचाने की।
उन्होंने इस चीज को बचाने की कोशिश करी।
कारण यह है इस दुनिया के अंदर किसी भी तरह
की संजीवनी
किसी भी तरह का विचार किसी भी तरह को किसी
चीज को पा लेना किसी भी तरह के विज्ञान को
पा लेना किसी विज्ञान में से या चार पांच
चीजों को मिलाकर जो नई खोज कर लेना ये
सारी की सारी ताकत
शुक्राचार्य जी में है। शुक्र में है ये
ताकत। तो उन्होंने यह देखा कि हर चीज को
पाना, उसके लिए प्रयास करना, उसके लिए
अपने भावों को ऊपर नीचे करना, उनको
संभालना, संतुलित करना ये सारा कुछ तो
शुक्र कर रहे हैं और खामखाई में बेचारा
बुध और चंद्रमा बदनाम है। खामखाई में
बदनाम है। क्योंकि ये जितना कुछ भी करवा
रहे हैं वो शुक्र होकर कर रहे हैं। तो
उन्होंने कहा है इसकी ताकत को आजमाया जाए।
कि शुक्र कर क्या सकता है? तो वहां से
उन्होंने पहले खुद आजमाया होगा और वहां से
फिर एक प्रथा शुरू हुई बाल ब्रह्मचारी की।
वहां से प्रथा शुरू हुई बाल ब्रह्मचारी
की। गुरुकुल में जाते थे। पूरा पढ़ते थे।
हर बच्चे का बहुत खास तौर पर ख्याल रखा
जाता था। और उनको संस्कार ऐसे दिए जाते थे
कि तुम्हें हर सूरत में अपना वीर्य बचा के
रखना है। और यह बचा के रखने के लिए
तुम्हें मेहनत बहुत करनी पड़ेगी। तुम्हारे
पास खाली समय नहीं होना चाहिए। तुम्हें
मेहनत बहुत करनी पड़ेगी। दिन भर आप चाहे
पढ़ो चाहे काम करो लेकिन कुछ ना कुछ करते
रहना पड़ेगा। इसीलिए
जो इंसान कुछ ना कुछ करता रहता है वह जीवन
में कामयाब जरूर होता है और जो घर बैठा
सोचता रहता है वो जीवन में कभी कामयाब
नहीं होता। जीवन में कभी कामयाब नहीं
होता। तो ये शुक्र
इस शुक्र में क्या-क्या है?
अगर हम देखें
इस कैल्शियम का अगर हम कलर देखें तो क्या
है?
वह वाइट है।
यही कैल्शियम का कलर के ऊपर खाद्य
पदार्थों में हमारे पास क्या है? देसी घी।
इसी खाद्य पदार्थों में क्या है? देसी
खांड।
अगर उसको भी गीला कर देंगे तो सेम सेम कलर
आता है। तो इसका मतलब शुक्र को बनाने के
लिए अपनी मज्जा मांस हर चीज को बनाने के
लिए देसी घी और देसी खांड यह बहुत काम की
चीज है। डॉक्टरों के कहने पे इनसे दूर मत
जाइए। क्योंकि आज की डेट में डॉक्टर खुद
देसी घी खाना शुरू कर चुके हैं। [प्रशंसा]
खुद शुरू कर चुके हैं।
अब ये ये तो इतना हुआ।
लेकिन अब शुक्र तो बहुत बड़ी चीज है।
चाहना पाना इसकी आदत है। नया ज्ञान
विज्ञान देना यह शुक्र का ही काम है। तो
अगर हम अपने दिमाग के अंदर झांक के देखें
जिसे कुदरत ने सबसे ज्यादा प्रोडक्टेड
लाइन में रखा है। जिसने इतना हैवी खोल
देकर के उसके अंदर हमारे दिमाग को कैद
किया है। आप जब उसके अंदर जो भरा हुआ है
ना फ्लूइड उसके अंदर जो
केमिकल लगा लीजिए वो है आप अगर उसे भी चेक
करेंगे वो 100% वही कैल्शियम वही वीर्य का
बना हुआ है जिसके अंदर हमारा दिमाग काम
करता है [प्रशंसा]
100% वही तत्व आपको मिलेंगे और कैल्शियम
के वो खास तत्व जो हमारे को नई ऊर्जा नई
चेतना नया सब कुछ देने में सक्षम है वो
दिमाग के अंदर वही वही कैल्शियम पाया जाता
है और वही हमारे वीर्य में होता है। तो
ऐसी अवस्था में
हमारी जो पहले की
व्यवस्थाएं थी कि बच्चे को इतने साल तक
ब्रह्मचारी रहना है। उसके बाद उसको गृहस्थ
आश्रम में रुकना है और गृहस्थ आश्रम में
भी ये नहीं कि उसको रोज मौका मिलता था
अपनी
पत्नी के साथ सोने का। वह भी समय लगता था
और ऐसी अवस्था में बलपूक काम करना दूर
दराज जाना इतनी मेहनत करना उसके कारण शरीर
भी पूरा कॉन्फिडेंट रहता था और उन लोगों
का चेहरे के ऊपर आप तेज देखिए आंखों के
अंदर उनकी चमक देखिए और उनकी वाणी का
प्रभाव देखिए इन सब चीजों में उनको
निपुणता मिलती थी
उन सब चीजों में उनको निपुणता मिलती थी और
जब ऋषि मुनि यही तपस्या तो बिल्कुल सीधी
रीड की हड्डी के साथ बैठकर के किया करते
थे तो उनको वो ताकत मिल जाती थी आसमान तक
जाकर के वहां की सारी खबर लाकर के हमारे
वेदों में लिखने के लिए यह शुक्र ही उनको
ताकत देता था। [प्रशंसा]
तो आज की डेट में हमारे समाज का जो
सत्यानाश हो रहा है
उसके पीछे कारण एक है कि बच्चों ने अपने
शुक्र को नालियों के अंदर बहा दिया है।
हमने उनको इतना अकेलापन दे दिया है कि वो
अपने शुक्र को कितना भी खराब कर सकते हैं।
और हम दादा-दादी पास में ना होने के कारण,
चाचा, ताऊ पास में ना होने के कारण, चाची,
ताई पास में ना होने के कारण उनको अकल
देने की कमी हो गई। वहां से पैदा हो रहे
हैं डिप्रेशन कम नॉलेज की वजह से।
[प्रशंसा]
वहां से पैदा हो रहे हैं नर्स। और
यही हमारे बच्चे जब उनको यह साइंस ही नहीं
बताई जाती उनको यह मेहनत की साइंस वीर या
बचाने की साइंस जब यह सिखाई नहीं जा रही
तो वो पढ़ क्या रहे हैं ये क्लासेस के
कोर्स जो इंसान को सिर्फ एक निकम्मा होने
के अलावा और कुछ नहीं दे सकते। एक भाषा
सिखाने के अलावा और कुछ नहीं दे सकते। कुछ
नहीं दे सकते। इसलिए अपने बच्चों को 12
साल की उम्र से चाहे उनसे झाड़ू पोछा
करवाओ, रोटियां बनवाओ, बर्तन धुलवाओ, कुछ
भी करो, कोई तो उनको प्रैक्टिकल दो। उनको
लाड प्यार से पालपाल के उनका सत्यानाश मत
करो।
और अच्छा उनको ट्यूशन देने की जगह उसके
मार्क्स 100% इसकी कोशिश करने की जगह मैं
कहता हूं कि उनको एक टीचर ऐसा दो जो उनको
दुनियादारी उनको जमा घटा बाहर ले जाकर के
सौदेबाजी करना बाहर ले जाकर के उनको
दिखाना कि रोड कैसे बनती है और ये तारे
कैसी पड़ती है या कोई भी काम उनको
प्रैक्टिकली दिखा के तो देखो उसको इतना
बिजी कर दो कि वो बाहर की सोचों को सोचते
हुए सोए
ना कि अपने आप से बातें करते हुए अपने दो
मिनट के सुकून को पाने के बाद सोए। छोटी
उम्र से यह सब कुछ करने लग जाते हैं। आजकल
तो लड़का भी लड़की भी सब बराबर है। यही कर
रहे हैं। और यही कारण है चिड़चिड़े बेकार
मनमर्जी करने वाले बच्चे पैदा हो रहे हैं।
और मां-बाप का जोर नहीं चल रहा। पैदा तो
उन्हीं ग्रहों में हो रहे हैं। कोई पता
नहीं है कि आपका बेटा भी ऋषि मुनि बनने के
काबिल हो।
लेकिन उसको जब ऐसा माहौल दिया गया वह
बिल्कुल नालायक होता जा रहा है। तो बेटा
[प्रशंसा]
यह शुक्र बचाने का गुण हमारे सिर्फ
संस्कारों में है। हमारे वेदों में है।
हमारे मंदिरों में जाकर के वही पूजा पाठ
की पद्धति जाने है। प्रैक्टिकल में है कि
प्रैक्टिकल के अंदर बच्चे का इतना दिल लगा
दो कि उसके पास अपने बारे में सोचने का
समय ना हो। और जैसे अभी यहां पर वो बोल के
गए थे डिप्रेशन के बाद। उनको भी डिप्रेशन
शायद इसीलिए हुआ होगा कि बचपन के अंदर
प्रैक्टिकली कुछ सीखा नहीं। बचपन के अंदर
प्रैक्टिकली कुछ सीखा नहीं। जवानी का वो
वक्त आया कि जब उनको यह नहीं पता था कि
मुझे काम क्या करना है। शायद पढ़ गए
होंगे। पर पढ़ना खाना नहीं देता। पढ़ना
जरूरतें नहीं पूरी करता। प्रैक्टिकल सब
कुछ करता है। और शायद मेरा यह सौभाग्य रहा
कि 14 साल की उम्र से मैं ज्योति सीखने
लगा और कभी ऐसा डिप्रेशन वाला दिन ही नहीं
देखा। [प्रशंसा]
तो मैं ज्यादा बड़ी कोई स्पीच नहीं देना
चाहता। मैं इतना ही कहता कि जिन वस्तुओं
से हमारे यहां का परमात्मा का चरणामृत
बनता है।
जिन वस्तुओं से पंचामृत बनता है। भाई इसका
सेवन तो अपने बच्चों को रोज को कराओ। दूध,
घी, मक्खन से दूर मत ले जाओ। लेकिन यह फोन
पकड़ा के उनका कुब निकलने वाली कवायद को
रोको।
यह उनकी रीड की हड्डी जितनी सीधी रहेगी ना
यह हमारा कैल्शियम पार्ट जो सिर्फ नीचे को
बह रहा है इसको ऊपर पहुंचाओ उधरगामी करो
इनका ताकि यह दिमाग के अंदर जाए और बच्चों
के अंदर स्पेशल ताकतें पैदा करें ताकि
आपके बच्चे के चेहरे पे तेज हो ओझ हो
याददाश्त हो और वो अपनी याददाश्त से सबको
चकित करे और काम करके अपना जीवन के अंदर
नाम कमाए और आपके परिवार का नाम करे बेटा
यह संस्कार देके देखो आपको कुंडली कुरियां
दिखाने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। आपके
बच्चे वैसे ही काबिल हो जाएंगे। [प्रशंसा]
जय माता की। आज के लिए शायद इतना ही बहुत
है। जय माता की।
आई थिंक मैंने आपकी जितनी भी स्पीच सुनी
है आज तक दिस इज द बेस्ट सो फार। इस स्पीच
को पहली बात तो मैं सब्जेक्ट मैटर को
सुनूंगा जाके। फिर मैं कम से कम 10 बार
आपकी स्पीच सुनूंगा। फिर मेरे ऊपर से
निकलेगी। फिर मेरे अंदर आएगी। थैंक यू सो
मच सर। वास्तव में रिसर्च का काम है ये।
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