जिन लड़कियों को पीसीओडी है, पीसीओएस है
या फिर हार्मोनल [संगीत]
डिसबैलेंस होता है बहुत ज्यादा। क्या उन
लड़कियों को भी ठीक किया जा सकता है?
हमारे ऋषि मुनियों ने इंसान के अंदर की
एक-एक तासीर को समझा, ग्रहों की तासीर को
समझा, आकाश मंडल को समझा और करके वो हमें
संस्कारों के रूप में दे गए। बेटा उनको यह
बताया गया था कि मेंसिस डे में नहीं
नहाना। क्योंकि मेंसिस डे के अंदर जैसे ही
औरत अपने शरीर पर पानी डालती है या सर पर
पानी डालती है वात और पित्त इतना ज्यादा
बढ़ जाता है कि उसको अपने शरीर के अंदर
होने वाली हलचल के बारे में समझ नहीं आता।
गुरुदेव जिन लड़कियों को पीसीओडी है,
पीसीओएस है या फिर हार्मोनल डिसबैलेंस
होता है बहुत ज्यादा क्या उन लड़कियों को
भी ठीक किया जा सकता है? उनकी हेल्थ को
स्वस्थ किया जा सकता है ग्रहों के जरिए,
उपायों के जरिए।
तुमने बहुत बड़ी रग छेड़ दी। एक
पहले ना हमारा जो सनातन सनातन यानी
साइंटिस्ट।
हमारे ऋषि मुनियों ने इंसान के अंदर की
एक-एक तासीर को समझा। ग्रहों की तासीर को
समझा। आकाश मंडल को समझा। धरती पर उपजने
वाली हर साइंस को और मिट्टी की वनस्पतियों
की ताकतों को समझा।
ऊर्जाओं को समझा और करके वह हमें
संस्कारों के रूप में दे गए। उसमें एक
संस्कार हमें और दिया था
जिसको बाद में पढ़ी लिखी पनीरी ने बेवकूफी
बता दिया। धत्ता बता दिया
और जबकि वो पढ़े लिखे ही सबसे बड़े अनपढ़
हैं।
वो क्या कहते थे कि मंथली साइकिल में औरत
को किचन में नहीं जाना चाहिए। क्या सारा
किचन का खाना खराब हो जाएगा?
अच्छा जी मेंसिस डे में मंदिर में नहीं
जाना चाहिए। परमात्मा नाराज हो जाएंगे या
परमात्मा पवित्र हो जाएंगे यही बताते थे।
और जबकि यह कोई बात ही नहीं थी क्योंकि
कोई जवाब देने वाला नहीं था। तो कौन उनको
समझाता तो वो बेवकूफों की पनीरी बड़ी हो
गई। तो वो मैसेज दे में आप मंदिर भी जाते
हैं और किचन में भी जाते हैं। ना यह चीज
हो गई।
लेकिन हुआ क्या? हमारी नानी दादी के टाइम
पर यह चीज हुआ करती थी। हमारी मां के टाइम
तक भी रही है। बाद में शायद हमारी माएं भी
बिगड़ गई। वही चीज हुई क्योंकि उनको साइंस
का नहीं पता था।
हुआ क्या? एक पहले शब्द चला करता था।
हमारी नानी दादियों के टाइम पे कि आज मैं
नहा ली। आज मैंने सर धो लिया।
यह एक शब्द हुआ करता था। इंडिकेशन हुआ
करते थे। वह क्या था कि जैसे ही मेंसिस डे
शुरू होते थे
बेटा उनको यह बताया गया था कि मेंसिस डे
में नहीं नहाना।
यह पांचों दिन तुम्हें नहीं नहाना।
क्योंकि मेंसिस डे के अंदर जैसे ही औरत
अपने शरीर पर पानी डालती है या सर पर पानी
डालती है वात और पित्त इतना ज्यादा बढ़
जाता है कि उसको अपने शरीर के अंदर होने
वाली हलचल के बारे में समझ नहीं आती। मूडी
होने लगती है, लड़ने को मन करता है,
चिड़चिड़ा होने लगती है, उदास हो जाती है।
उसको यही नहीं पता होता कौन सा काम करना
है, किस तरह से करना है, किसको जवाब कैसे
देना है। अंदर एक बहुत बड़ी लड़ाई शुरू हो
जाती है। इस समय के अंदर और वो हो रही
हलचल का कारण औरत को पता ही नहीं चलता।
लड़की को पता ही नहीं चलता। ठीक है?
क्योंकि लड़ाई तो सारी अंदर चल रही है।
वात और पित्त बढ़ा हुआ है।
तो ये परमात्मा ने कमी दी या खासियत दी
खासियत ही होगी जो एक बच्चे को जन्म देती
है। इस पूरी सृष्टि का निर्माण करने में
इस शक्ति का कितना बड़ा हाथ है। तो वो तो
आदरणीय है ही। और हमारे यहां फिर एक बीच
में बात आई कि इसको बुरा मानते हैं। मन से
ना हमारे हिंदुस्तान में प्रथाएं रही हैं
कि जिस दिन बच्ची जवान होती थी जिसको उसको
पहले पीरियड आते थे जश्न मनाया जाता था।
उसके लिए पूरा गांव गवा इकट्ठा हो के उसको
तोहफे भी देता था। क्योंकि उसके लिए कुछ
ना कुछ अच्छी प्रार्थनाएं भी होती थी। गीत
भी गाए जाते थी। समझ गए ना? हमारे यहां तो
यह पहले ही उत्सव का विषय विषय रहा है। यह
सच्चाई है। और इन दिनों के अंदर नहाने से
जब इतना बड़ा उत्पात मचता है। है ना? और
इसीलिए इनको मना किया जाता था। अब जो
नहाया नहीं होगा उसकी फीलिंग देखो। उसको
परमात्मा के दर्शन करते हुए अच्छा नहीं
लगेगा। तो उसको छूट दे दी गई कि भाई इन
दिनों में तू मंदिर मत जा। वहां पवित्र
कार्य हो रहे हैं। तेरे मन को यह होता है
कि आज तू पवित्र नहीं है तो तेरा मन
खामखाई में उखड़ेगा। तो इसीलिए उसको
स्वेच्छा से मना किया। उसको मंदिर जाने से
मना नहीं किया। लेकिन उसका अपना फील नहीं
मान रहा कि मैं परमात्मा के इस तरह से
मंदिर में जाऊं। तो वो रुक गए।
अब उसी को मां बहन को यह फील आता है कि
मैं नहाई नहीं हूं। मैं बच्चों के लिए आटा
कैसे गंदू? मैं बच्चे को दूध उबाल के कैसे
दूं? मैं बच्चे के लिए सब्जी कैसे बनाऊं?
अपने घर वालों के लिए सब्जी कैसे बनाऊं?
तो उसको छूट दे दी गई कि ठीक है तू किचन
में बस जा। उसके ऊपर कोई जोर जबरदस्ती
नहीं की। लेकिन उसको छूट दे दी कि ठीक है
इतने दिन किचन में बचा। अब वो करते-करते
बात यहां तक की पक गई कि अब लोगों को रीजन
तो इसका पता नहीं था। बस इतना इस पांच दिन
के अंदर मंदिर नहीं जाना। इस पांच दिन के
अंदर किचन में नहीं जाना। लेकिन असली
साइंस को छोड़ के रोज नहाने लग गई।
उस नहाने ने
यह जो धात की प्रॉब्लम होती है, सफेद पानी
जाता है, लिकोरिया होता है, पीसीओडी की
दिक्कत होती है, गायनी प्रॉब्लम होती हैं।
समझ गए? जितनी भी जो इंफेक्शन होते हैं
प्राइवेट पार्ट के ऊपर यह सारी प्रॉब्लमों
ने जन्म लेना शुरू कर दिया। अगर आज से
सिर्फ दो पीढ़ी पीछे तक या तीन पीढ़ी पीछे
तक देखें एक माएं पांचप सात-सात पुत्र और
पांचप सात-सात पुत्रियां आराम से पैदा कर
देती थी। क्योंकि उनके टाइम पर वो सच में
उन दिनों के अंदर नहीं नहाती थी। ठीक है?
यह जब से यह चलन इस मेंस डे के अंदर नहाने
का हुआ है, आप देखिए पुत्रियां स्वस्थ है
ही नहीं। उनको रोज बीमार होना पड़ता है।
हर महीने बीमार होना पड़ता है। हर महीने
उनको पेट दर्द, शरीर दर्द नहीं तो कमर
पांव के दर्द से उनको जूझना पड़ रहा है।
तो बेटा अपने ऋषि मुनियों की इस साइंस को
मानो। इसको यूनिवर्सल ट्रुथ समझ के
एक्सेप्ट करो कि अगर इन दिनों में हमारी
बच्चियां बहुएं नहाएंगी तो वह बीमार ही
होंगी। तो इस पांच दिन की उनको छूट दीजिए
कि बेटा नहाने की जरूरत नहीं। हाथ मुंह धो
लो। जितनी जरूरत है बस उतना कर लो और पांच
दिन बाद नहा लेना। इतना ही करना है। इतनी
बड़ी साइंस, इतनी गहरी साइंस हमारे ऋषि
मुनियों ने हजारों साल पहले हमें दे दी
थी। और यह हमारे ऋषि मुनियों की साइंस को
धत्ता बताते हैं। और जबकि इस सच के पता
चलने के बाद जिस दिन इसके बारे में ये
मॉडर्न साइंस ने भी खोज कर ली ना बेटा उस
दिन यह अपने आप को बेवकूफ कहने से नहीं
रुकेंगे। इनको तब जाके पता चलेगा। या तो
आज से यह मान के एक्सेप्ट करके बेटा इसको
आजमा के देख लो। तब आप अपनी गलती को
स्वीकारोगे नहीं तो इंतजार करो कि कब आप
अपने आप को बेवकूफ साबित करते हो। ठीक है?
और यह करना बेटा इनसे बच्चियों की पीसीओडी
की दिक्कत, लिकोरिया की दिक्कत, गुप्तांग
के ऊपर होने वाली परेशानियां, मेंसिस जे
में होने वाला दर्द यह सारी प्रॉब्लम इन
पांच दिनों में ना नहाने से ठीक हो जाती
है। ठीक है? तो करके देखिएगा। दाता जरूर
सुखी रखेगा।
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